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पर्यावरण

कर रही चीत्कार धरा अम्बर अब, सूखे अंकुर पूछ रहे हैं, कब बरसेगा शीतल नीरव, तृण तृण धरती के सूख रहे हैं, कहां गये नीरज सुमन धरा से? कोयल की वो कुहुक कहां है? वन उपवन सब रुष्ट हो चले, मयूर पंख की लूट कहां है? जल जीवन सब मैला लगता, गंगा पावन लहर कहां है? दूषित जीवन शोषित उपवन, मंद समीर प्रलोभन कहां है? है गर जन जीवन को बचाना, पर्यावरण बदलना होगा, वसुधा के ऋण के खातिर, तृण तृण स्वेद पिघलना होगा।। ©Priyanka Mishra

मुशायरा: एक परिचय

एक संगोष्ठी जो काव्य प्रेमियों को अपनी तरफ आकर्षित करती है मुशायरा कहलाती है। सांस्कृतिक विस्तार देखें तो यह भारत, पाकिस्तान तथा डेक्कन की संस्कृति का अभिन्न अंग है जिसकी अत्याधिक प्रख्याति हैदराबादी मुस्लिम में है। Photo Courtesy Rajadeendayal.com समकालीन समय में मुशायरा आयोजन में शायरों को आमंत्रित किया जाता है, आैर बेहतरीन, उम्दा शायर को आयोजक आखिर में पेश करते हैं ताकि महफिल सजी रहे और समां बंधा रहे । एक जलती हुई मोमबत्ती पंक्ति में थमा दी जाती है जिसके हाथ में होती है वो महफिल को अपनी शायरी से राैशन करता है।  जब शमां बंधता है तो दर्शक कभी कवि का उत्साह "वाह-वाह " करके बढ़ाते हैं तो कभी उनकी आधी पंक्ति को पूरा कर के आज कल 'कवि सम्मेलन  मुशायरा ' का दौर है जहां पारंपरिक मुशायरा हिन्दी के साथ आयाेजित किया जाता है।  मुशायरा का कई स्वरूप है ' तराही मुशायरा ' उसी में से एक है  जो एक प्रतियोगी स्वरूप में है जहां शायर को एक मिॆश्र दी जाती है और कवि को उस मिश्र का उपयोग कर के गज़ल गढ़नी होती है । गज़ल भी इसी का एक स्वरूप है। सबसे चाव से सुना जाने...