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सफ़ेद कमीज़ वाला शख्स

 सलीके से उसने नज़र उठाई झरोखे पर खड़ी वो मुस्करा रही थी, कुछ इशारों में काफी बातें कह गया वो सफ़ेद कमीज़ वाला शख्स वो पेड़ आज भी कहानियां तलाशता है शायद फिर से सफ़ेद कमीज़ में वो शख्स, नज़रें उठाए, झरोखे से झांकती  उन झुकी नज़रों को निहार रहा होगा खैर क्या खूब कही उनकी दास्तां भला नज़रों में कहानियां कौन बनाता है झरोखा तो आज भी है और वो पेड़ भी पर शायद उस मुसाफ़िर ने रास्ता बदल दिया पेड़ तो वहीं था, इंतज़ार में हर वसंत नए मुसाफिरों का झुंड आता है कुछ एक ही होते हैं, ठहरते हैं, सुस्ताते हैं मिलते मिलाते हैं और याद आते हैं