धुंधली सी शाम मदहोश सी हवा
जब यूं उस पेड़ को छू कर गुजरती है
तो उस अस्सी बरस के बरगद को
जीवन के अस्सी बसंत थपेड़ों से गुजरते हैं
वो थका सा लगता है,
उसकी टहनियां फैल चुकी हैं
नित नए नूतन वर्ष कुछ नई पत्तियां
अठखेलियां करती हुईं उससे निकल जाती हैं
वो इतराता है, अपनी शाखाओं पर
शाखाओं पर लगी पत्तियों पर
पत्तों में छिपे फलों पर
बरगद बृहद है, विस्तृत है
वो छांव है, शायद बहुतेरों की
पर वो ढलता सा दिखता है
कुछ सूरज सा, कुछ मद्धम सा
अच्छा! उसकी उमर हो चली है
वो ताकता है, निहारता है,चाहता है,
कि हर गुजरता पल ठहरे, रुक जाए
नए साल के हर जश्न में,
वो कुछ सहमा सा ,कुछ सिहरा सा लगता है
उसकी जड़ें कमज़ोर हो चली हैं
उसे ढहने का खौफ है, वो सिसकता है
उस बरगद को शाम गुलजार सी पसंद है
पर ऐसी शामें तो ढलने आई है,
रात स्याह सी हो चली है
आंधी भी तेज़ है,बरगद में खौफ है
पर वो बरगद तो तुम्हारे यहां भी है
बाहर अकेला पहरा देते हुए, स्याह को समेटे हुए।
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