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पर्यावरण

कर रही चीत्कार धरा अम्बर अब, सूखे अंकुर पूछ रहे हैं, कब बरसेगा शीतल नीरव, तृण तृण धरती के सूख रहे हैं, कहां गये नीरज सुमन धरा से? कोयल की वो कुहुक कहां है? वन उपवन सब रुष्ट हो चले, मयूर पंख की लूट कहां है? जल जीवन सब मैला लगता, गंगा पावन लहर कहां है? दूषित जीवन शोषित उपवन, मंद समीर प्रलोभन कहां है? है गर जन जीवन को बचाना, पर्यावरण बदलना होगा, वसुधा के ऋण के खातिर, तृण तृण स्वेद पिघलना होगा।। ©Priyanka Mishra