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Showing posts from September, 2020

शून्य

शून्य शून्य वैसे तो गणितीय गणना का एक अंक है, जिसका महत्व उसके स्थान एवं प्रयोग पर निर्भर करता है, परंतु शून्य विचार इससे कुछ भिन्न है, विचार शून्य होने का भी महत्व स्थिति एवं प्रयोग पर निर्भर करता है परंतु यह गणितीय अंक की भाँति सरलता से व्यक्त नही किया जा सकता । विचार शून्य मनुष्य के विवेक में चाह कर भी कोई स्मृति ठहर नही पाती, कोई भी दृश्य दो पल नही ठहरता, कोई भी गीत याद नही आता, कोई कविता रसमय नही लगती, मनुष्य कुछ कहना चाहता है परंतु वह नही जानता कि क्या है वह बात। प्राण उलझन में पड़ जाते हैं और बुद्धि बर्फ के समान ठंडी-सफेद। विचार शून्यता का जिन्हें अभ्यास हो उन्हें यह शांति प्रदान करता है, परंतु यदि हम ना चाहते हुए भी विचार शून्य हो जाये तो यह एक अजीब सी उलझन होती है। विचार शून्यता एवं इसके लक्षणों से एक कवि सर्वाधिक कष्ट सहता है क्योंकि इसके चलते वह छंदों का निर्माण नही कर पाता एवं विषय से भटक जाता है। मैं भी कोई कविता लिखने बैठा था शायद! परंतु अब न विषय याद है ना छन्द ही जन्म ले रहे हैं। विचार शून्यता के कारण तो वह प्रियतमा जिसे शायद ही कभी भूलना सरल रहा हो, जिसकी आँख की पलकों क...